मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

होना

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मेरा होना साबित हो
तो दुश्मन की तरह
जो प्रतिरोध से रचता है अपना व्यक्तित्व
न कि भाट-चारण की तरह

मेरा होना साबित हो
तो मेज पर रखे पानी के कंपन की तरह
जो मेज के पूरे वजूद को  थर्राता है
न कि पेपरवेट की तरह

मेरा होना साबित हो
तो उस स्त्री की तरह
जिसे सिर्फ मानचित्र में नहीं भूगोल में होना जंचता है
न कि नवउगनी कवियित्री की तरह

मेरा होना इस बात से तय हो कि
मेरे भीतर आदमीयत कितनी बची हुई है
न कि सब गुनाह माफ़ की तरह

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

गोली मार दो


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उत्तर आधुनिक वेदोपदेश


यदि वे तुम्हें टक्कर दे
अपनी योग्यता से कर दे तुम्हें मात
तो इंतजार न करो
उन्हें गोली मार दो
या काट दो फिर ज़बान
या कि कर दो लूल-लांगड़

दरअसल,
भारत में योग्य होना
सिर्फ और सिर्फ
ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए
सर्वाधिकार सुरक्षित है!!!

यह जानों कि-
वेद शूद्रों ने लिखा है
और किसानों, श्रमिकों और मेहनतकश अनगिनत हाथों ने
उसे हर राग, लय, सुर और ताल में गाया है
ध्वनि-मिश्रित स्वर, शब्द और भाषा में स्फोट किया है

याद रखों कि-
हम ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों ने तो उसे हथिया भर लिया है
नमस्तस्यै...नमस्तस्यै...नमस्तस्यै...नमों नमः...
कहते हुए, गाते हुए, बखानते हुए
और यही नहीं इन नीच-कूल-अधर्मियों का, शूद्रों का
हांड़-मांस-हाथ-हथेली....उनका सर्वस्व
अपने शोषण के बहुविध औजारों से उधेड़ते हुए

प्रतिरोध में सर उठाते ही उनका सर कलम करते हुए
अपनी बात न मानने पर उनकी आंख फोड़ते हुए
उनकी बेटी-बहू और औरतों का अस्मत लूटते हुए

यह अलग बात है कि हम उन पर जितना ही बोझ डालते हैं
उनकी विद्रोह की चेतना को बांझ बनाते हैं
उनकी आवाज़ की भूमिका पर स्टिकर चिपकाते हैं
उन्हें धर्म की बिसात पर मौनी-अन्धेरे में धकेलते हैं
थोड़ा भी भयातुर होते ही अपनी शास्त्रीय भाषा तक बदल देते हैं
किन्तु वे फिर-फिर ज़िन्दा होते हैं
....वे फिर-फिर हम पर भारी पड़ते हैं

अतः शासन के बहाने अपत करने वालों को चाहिए कि-
थोड़ी भी आशंका होते ही
उन्हें तत्काल गोली मार दो....उनका वध कर दो
यही भारतीय परम्परा रही है
और हमारे शासक-शोषक होने/बने रहने की वास्तविक सबूत
वीर भोग्या वसुन्धरा!!!


शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

पानी

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बंधु! खुले आसमान में
प्रकृति की कोख में पानी पलते हैं
वे अपनी इसी कोख से पानी जन्मते है

ज़मीन पर पानी को दुख कचोटता है, तो प्रकृति
आत्मविह्वल माँ-बाप की तरह
लोर भी पानी की ही भाषा में उड़ेलती है
प्रकृति अपना खून चूसकर और अतंड़ियां जलाकर
अपनी कोशिकाओं को सोखकर पानी पैदा करती है
ताकि मनुष्य को पैदा करने वाली माँ की कोख में
किसी भी सूरत में पानी बची रहे पर्याप्त

दरअसल प्रकृति वसुंधरा से अधिक मनुष्य की चिंता करती है
मानों उसके लिए मनुष्य मुख्य उत्पाद है और बाकी बचे सब बाई-प्रोडक्ट
इसीलिए प्रकृति स्वभावतः हिंस्र पशु नहीं होती...शेर, चिता, बाघ नहीं होती
वह पानी की तरह रंगहीन, स्वादहीन, रूपहीन लेकिन सबसे अहम खुराक होती है
हां, किसी के लिए ऐशगाह तो किसी के लिए जीवनदाह होती है

बंधों, प्रकृति अपनी तक़लीफों से ही धार पाती है
संकट की दुश्चिंताओं और प्रोपेगेण्डाओं के बीच पनाह पाती है
तिस पर भी वह ठठा कर बरसती है
धरती के नस-नस में घुलती-मिलती, रींजती-भींजती है
यह पानी ही कहीं नदी, तो कहीं तालाब
कहीं सागर, तो कहीं समुद्र और सैलाब का नाम पाती है
रूपासक मनुष्य कहीं सुख से बिछलाते हैं
कहीं अपना करेजा तर करते हैं
तो कहीं पितरों को तारने के बहाने भरी-पूरी नदियों को ही तार देते हैं
आज प्रकृतिदेय इसी पानी के लिए कहीं जंग, तो कहीं संगोष्ठी जारी है
कहीं अनशन, तो कहीं आन्दोलन का गुमान तारी है
साधो, आदमी के भीतर ‘आदमियत का पानी’ जितना नीचे उतर रहा है
सूरज का पारा उतना ही सातवें आसमान पर चढ़ रहा है
प्रकृति जब इस कदर सब जगह मरती है, तो भाप बन उड़ती है

शासक भौंक रहा है-‘प्रकृति बचाओ...जीवन बचाओं...पानी बचाओ’
आदमी भी बिसूर रहा है और तकनालाॅजी भी फनफना रही है
भीतर-बाहर हर जगह पीब-मवाद, फेन-गाज....बजबजा रहे हैं
आप खुद ही देखिए कि हम-आप-सब कौन-कितना प्रकृति बचा रहे हैं
आदमी फिर-फिर पैदा होता है...क्या प्रमाण है?
फिर मानिंद काफ़िर क्यों चिल्ला रहे हैं: बारिश....बारिश...बारिश!!! 

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

डर


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हम अपनी सभ्यता के खोने से
और संस्कृतियों के मिट जाने से नहीं डरते हैं
जितना कि
सभ्य और सांस्कृतिक मनुष्य होने से

भूमिका में बच्चें

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दीपू
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बच्चें
अपनी मां से
हीक भर लिपटने का चाहत लिए
जगतें है पूरी रात

बच्चें
नहीं सोतें तबतक
जब तलक चलती है मैराथन दौड़
उसके पिता की रात संग

बच्चें
अपने माँ-पिता के संघर्षों में
शामिल होते हैं
पूरी ईमानदारी के साथ

किन्तु सहज, तरल, बेआवाज़
मौन की भाषा में!

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

सब कुछ हुआ साफ अबकी बार...क्यों?

अब क्या लिखना, पढ़ना और बोलना.....रामराज्य आ गया देश में बड़ी जल्दी। अहो रूपम....अहो ध्वनि!! जिसके पास है सबकुछ वह करे जय-जय; और जिसके पास नहीं है वह धार्मिक जाप करे, सत्संग करे, आरती करे....उसके भी दुःख के दिन उबरेंगे ही। देश को निमोनिया(मोदीकरण) से अमोनिया(अमेरिकीकरण) में रूपान्तरण हो ही चुका है; भाई स्वाद तो चखिए।

शायद! इसी से मेरी भी भला हो जाए। जय मोदी, जय मोदी। यह अलग बात है कि-'सांच कहे, तो मारन को धावे।' इससे अच्छा है; न कहो। वैसे भी मेरे कहने से जन-जन के 'अच्छे दिन' थोड़े आयेंगे। उसके लिए तो मोदीनुमा जन-धन चाहिए। मुझे भी। मैं कौन बिल्ला बहादुर हूं?

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

माननीय प्रधानमन्त्री के नाम सन्देश

  02 अक्तूबर, 2014; गांधी जी का जन्म दिवस

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स्वच्छता का वंशवृक्ष लगाएं, भारत को स्वस्थ, सानंद व समृद्ध बनाएं

‘स्वच्छता का नारा बुरा नहीं है। यह अभियान ग़लत नहीं है। यदि इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति सात्त्विक हो, तो राजनीतिक शुचिता, पवित्रता और स्वच्छता के सन्दर्भ में इसकी प्रयोग/प्रयुक्ति निरर्थक नहीं है। लेकिन यदि पूर्व-सरकारों की तरह मंशागत लक्ष्य में ही नीतिगत दोष हो या कि लक्ष्य-निर्धारणकर्ताओं द्वारा वह प्रचारित ही कुछ इस तरह हो कि इसमें सतहीपन और उथलापन साफ दिख जाये, तो शेष अलग से कुछ कहने को क्या रह जाता है। जो कुछ दिखाई देगी; जनता उसी को न सत्य और प्रामाणिक आधार मानेगी। बाकी का क्या ठिकाना!
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तुरंत उधर से जवाब आया:

thank you for writing to the Hon’ble Prime Minister.

Your message is valuable to us!  PMO look forward to your support and
active participation in good governance.