शनिवार, 8 नवंबर 2014

Indian Youth : Reflection of Actual Meaning, Perception and Expression

Y for Yew
O for Outvote
U for Unite
T for Trait
H for Helpfull
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Paper presented by
 Rajeev Ranjan Prasad
Senior Research Fellow(Mass Communication & Journalism)
Functional Hindi, Dept. of Hindi
Banaras Hindu University
Varanasi-221 005
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Contact : rajeev5march@gmail.com 
 
नोट: हमारे काम का तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि हमें आगे बढ़ने का हौसला कौन दे रहा है, हिम्मत कौन बंधा रहा है और हमसे अपनी उम्मीद कौन बांध रहा है....अफसोस! हमारे मौजूदा अकादमिक जगत में इतना बेहायापन है कि आपको सिवाय रुसवाई के कुछ भी नसीब नहीं। हमारे काम तक को कौड़ियों के भाव लगाते हैं, क्योंकि हम अपनी हिन्दी भाषा में अपने होने का राग छेड़ते हैं, औरों को सीधी चुनौती देते हैं।
आपसब भी बहस-मुबाहिसे के लिए सादर आमंत्रित हैं!-राजीव रंजन प्रसाद

Political Mythology about Indian Youth : पूरा झूठ, पूरा फ़साना

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Paper presented by
 Rajeev Ranjan Prasad
Senior Research Fellow(Mass Communication & Journalism)
Functional Hindi, Dept. of Hindi
Banaras Hindu University
Varanasi-221 005
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Contact : rajeev5march@gmail.com

Permutations-Combinations of Indian Youth : Inner Base and Core Structure of 21st Centuary Life-Span

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Paper presented by
 Rajeev Ranjan Prasad
Senior Research Fellow(Mass Communication & Journalism)
Functional Hindi, Dept. of Hindi
Banaras Hindu University
Varanasi-221 005
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Contact : rajeev5march@gmail.com

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

सुनो-सुनो प्रधानमंत्री सुनो

काशी से राजीव रंजन प्रसाद
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‘‘.....धरती को बौनों की नहीं
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं
कि पांव तले दूब ही न जमे
कोई कांटा न चुभे, कोई कली न खिले

न बसंत हो, न पतझड़
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा

मेरे प्रभु
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना
गैरों को गला लगा न सकूं
इतनी रुखाई कभी मत देना।’’

मोदी जी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उस रोज एकदम सुबह मिले, जिस रोज उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना था। 26 मई की संध्या मनमोहक थी; मनमोहन सरकार की विदाई के बाद जो सरकार सत्ता में काबिज़ होने जा रही थी; उसका आगाज़ सम्मोहक था। टेलीविज़न सुबह से सुरियाए हुए थे। हर तरफ मोदी। हर बात में मोदी। मोदी को ख़बरिया चैनल वालों ने क्षण अथवा पल के इतने टुकड़ों में बाँट दिया था कि कई मर्तबा ऊबकाई/मितली आ रही थी। प्रशंसा और तारीफ से परहेज़-गुरेज़ नहीं की जानी चाहिए; लेकिन उसमें अतिरेक हो या अटपटापन हो; शाब्दिक लफ्फ़ाजी और भड़ैतीपन हो, तो वह आपको निश्चित ही खिजा देती है। उस रोज गोरखधाम एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। दर्जनों काल-कलवित हो गए थे। सैकड़ों घायल। लेकिन मीडिया मोदीनामी गाने में इस कदर मशगूल थे, मानों वे यह साबित करना चाहते थे कि कौन किससे कितना बड़ा भाट या चारण है। ज़मीन के पत्रकार आजकल मीडिया में नहीं हैं और जो हैं वे किस मिट्टी के बने हैं; जनता को सबकुछ समझ में आ रहा था।

उस रोज मैं विनती कर रहा था। मेरे मुँह से अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी हुई उपर्युक्त पंक्तियाँ स्फूट हो रही थीं। मुझे लग रहा था कि देश को पहली बार कोई ज़बानदार नेतृत्व मिला है; हे मेरे  ईश्वर! इस व्यक्ति को सुबुद्धि देना कि यह जनता की सोचे, ज़मीन की सोचें और ज़माने के साथ अपने मजबूत पांव को दुनिया में टिकाने का हरसंभव अवसर तलाशे। मुझ जैसे साधारण लोग जिसे मताधिकार प्राप्त है; किन्तु अपनी बात सीधे देश के मुखिया तक नहीं पहुँचा सकते हैं; अपनी पीड़ा, तकलीफ़ या औरों के लिए सोचे जाने वाले विचारों को साझा नहीं कर सकते हैं; उनके लिए मौन-याचना रामबाण है। मोदी जी ने कुछ दिनों के अन्दर ही अपनी मंशा जतानी शुरू कर दी-‘अपनी बात सीधे प्रधानमंत्री से साझा करें।’ यह डिजीटल इंडिया के प्रस्तावक द्वारा प्रत्येक भारतीयों को दिया जाने वाला एक बड़ा मौका था। लेकिन मोदी जी देश की एक बड़ी आबादी ऐसी भी है जो अपनी जान दे देती है लेकिन अपनी दुःखों की डफली नहीं बजाती; वह जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन नहीं करती। वह जानती है कि आंख-दीदा वाली सरकार देर-सबेर जब आएगी; उनका दुख जरूर हर लेगी। बिना कुछ कहे, बिना कुछ मांगे।

प्रधानमंत्री ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजीटल इंडिया’, ‘रन फाॅर यूनिटी’, ‘स्वच्छ भारत’, ‘जन-धन योजना’, ‘सांसद ग्राम गोद योजना’ आदि मसलों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। लेकिन इन विचारों  का लाभ कितना विकेन्द्रीकृत है; इस पर प्रमुखता से विचार किया जाना चाहिए। यह भारत उभरते हुए मध्यवर्ग का सिर्फ नहीं है। यह भारत उन पूँजीपतियों का ही सिर्फ नहीं है जो समाज-सेवा की सार्वजनिक छवि के समानांतर अनगिनत ऐसे काम करते हैं जिसे सही मायने में ‘करतूत’ की संज्ञा दी जानी चाहिए। लेकिन बोलेगा कौन? ख्यातनाम साहित्यकार-कवि शमशेर बहादुर सिंह कम हैं जो यह कह सकें-‘प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल-सा; सत्य की है एक बोली, एक बात।’

नरेन्द्र मोदी अब भाजपा के चेहरे नहीं रहे। वे अब भारत का भविष्य गढ़ने वाले निर्माता हैं। उन्हें अपनी वैयक्तिकता से ऊपर उठना होगा। टेलीविज़न और नवमाध्यमों की चालाकियों के बिसात पर ‘फ्लैट’ होने की जगह उन्हें अपनी आन्तरिक शक्ति, साहस और संकल्पनिष्ठा के द्वारा सवा अरब की आबादी वाले इस मुल्क को आश्वस्त करना होगा कि वे भारत के सच्चे कुम्हार हैं; एक ऐसा सर्जक जो अपने गढ़े पात्र में इतनी पात्रता पैदा कर देने की अकूत क्षमता रखता है कि-‘औरन को शीतल करें....आपहूं शीतल होय’।
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पी.एम. आज काशी विराजै

कार्यक्रम आज: 07/11/2014
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प्रधनमंत्री नामचीन नहीं हैं। कहा जाता है कि वे काम को वरीयता देते हैं और काम करने वाले को अहमियत। काशी में उनका ‘परफार्मेंस’ कैसा रहा है; यह उनके आगमन की अगुवाई में काशी द्वारा दी गई प्रतिक्रियाओं से ही जाना जा सकेगा।

 यह तय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘प्रधानमंत्री के रूप में’ काशी का यह पहला दौरा है। देव-दीपावली के बिहान ही वे इस पावन-पवित्र नगरी में पहुंच रहे हैं। उन्हें यहां पर गंगा नदी का 'हाल-ए-हक़ीकत' देखना है। यह जानना है कि उनके कार्यकत्र्ता और मातहत लोग बनारस को जापान के ‘क्योटो शहर’ से मुकाबला कराने में कैसे और कितने जी-जान से जुटे हैं?  ‘एक गांव हर सांसद की गोद में’ योजना के अन्तर्गत उन्होंने जिस गांव को चुना है; वह रातों-रात बदल रहा है, तो क्यों नहीं दूसरे गांवों का इसी तरह कायाकल्प हो सकता है? इच्छााशक्ति, संकल्प, निष्ठा, समर्पण, ईमानदारी, प्रतिबद्धता, निष्पक्षता आदि शब्द राजनीतिक कार्यों में एक उत्साही और उमंगदार शुरुआत के बाद क्योंकर निरर्थक हो जाते हैं? इन सारे तथ्यों और जानकारियों से प्रधानमंत्री को रू-ब-रू होना होंगा।

बीते महीनों में अपने काशी केन्द्रित जनसम्पर्क-कार्यालयों के किए-धराए को भी उन्हें जांचना-परखना होगा। यह जनता भी जानती है और स्वयं प्रधानमंत्री भी जानते हैं कि प्रायोजित नारों के उद्गार और ‘मोदी-मोदी’ के शोर से जनता का भला नहीं होने वाला है या कि उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक कौशल, नेतृत्व और निर्णय-क्षमता साबित नहीं होने वाली है। चलिए, आज हम भी उनके साथ दो-कदम चलते हुए उनकी कर गुजरने की तबीयत को नजदीक से देखें!

हत्या के विरुद्ध आत्महत्या

:: भारत में सत्यानाशी विकास में अविनाशी पूंजीवाद का बढ़ता महाप्रकोप यदि दिखाई नहीं देती, तो समझिए हमारी चेतना का सामूहिक वध होना तय है! ::
हमारी मौत को
आत्महत्या माना जाएगा
क्योंकि हम सामूहिक वध अथवा सरकारी हत्त्याओं के खिलाफ लामबंद होना चाहते हैं
अपने लिए रोटी, कपड़ा और मकान चाहते हैं
हम अपनी ज़मीन के साथ
अपनी हवा-बतास के साथ
नल-कल-कुओं के साथ
ताल-पोखर और नदियों के पूजन-पाठ के साथ
समूह में और निर्भीक जीना चाहते हैं!

सोमवार, 3 नवंबर 2014

'Cast Censorship' promoted as a UNIQUENESS of Indian Democracy : Rajeev Ranjan Prasad

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'caste censorship' is exist in Indian democracy  with much powerfully and majority. I have proposed it on the basis of research and collecting materials/samples. This is use as uniqueness and specialty of Indian Social-Culture. It's governed by social hierarchy. Attention please, it has no part of social freedom, it is no part of similarity. In real meaning it is part of heterogeneous tradition.