सोमवार, 3 नवंबर 2014

सोचिए, क्या आपके बच्चे सलामत बचे रहेंगे!


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एक स्कूल जाती बच्ची को ‘सेक्स आइटम’ की तरह ट्रीट किया जाता है। हम-आप-सबलोग खामोश बने रहते हैं। सबको अपनी खामोशी पर गाढ़ा विश्वास है। सबलोग अच्छे दिन के इंतजार में हैं।.....

मोदी जी को सरदार फिर पटेल बनाया जाना!

2014

 कल मोदी जी रेडियो पर दिल से बोले। देसी सीमा में ज़िन्दा मानुषों ने उन्हें सुना और सराहा भी खूब। मोदी बोलते वक्त ज़बानी टोन में एकदम विनीत हो जाते हैं। यह बड़ी खासियत है जो पहले के वक्तृतापूर्ण राजनीतिज्ञों के बोली-बात  एवं कहनशैली से इन्हें भिन्न साबित करती है और अपेक्षाकृत अधिक नजदिकीयात भी महसूस कराती है। संचार का मुख्य उद्देश्य भी यही है। हमारे द्वारा भेजे गए ‘अर्थपूर्ण संदेशों’ का प्रभाव दूसरे लोगों पर होना चाहिए, वे कुछ प्रतिक्रिया दें, उनमें कुछ बदलाव आए, उनके और हमारे बीच एक साझेदारी या समझ बने; यह आवश्यक है। संचारविज्ञानियों एवं मनोभाषाविज्ञानियों ने भी इन्हें ‘पर्सन विद डिफरेंस’ के साथ वर्तमान राजनीति में नोटिस लिया है। उनकी दृष्टि में नरेन्द्र मोदी की स्नायु-शक्ति बहुत मजबूत है जो कि आन्तरिक स्नायु-मंडल द्वारा संचालित-अभिप्रेरित है। स्नायु-मंडल के अन्तर्गत आते हैं: 1) उत्तरदायित्व, 2) समयनिष्ठा, 3) सांवेगिक स्थिरता, 4) आत्मविश्वास और 5) अहम्-शक्ति। दरअसल, जनता के सामने बोलना जितना आसान है; उसके मिज़ाज को भांपना बिल्कुल कठिन।

दिनोंदिन नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता उनके व्यक्तित्व-व्यवहार का साधारण ब्याज है। इसे काॅरपोरेट प्रचार-प्रबंधकों के झांसे में पड़ चक्रवृद्धि ब्याज नहीं समझना चाहिए। यदि वे इस लोप्रियता को जन-उगाही का जरिया समझने की भूल किए, तो अधिक संभव है कि उन्हें धर्मगुरु और धर्म-प्रचारक भी नहीं माफ करेंगे। ईष्र्या(कई बार यह प्रशंसातिरेक के मुलम्मे में जाहिर-प्रदर्शित होती है) बड़ी बलवती चीज है; और मोदी के इर्द-गिर्द इसका जबर्दस्त गुब्बार-अंबार जमा होता दिख रह है। भाजपा में कुछ नहीं है। पार्टी में आया ये सारा चमक मि. प्राइम मिनिस्टर की निष्ठा, उनके बेलागपन और जन-संवाद को सबसे अधिक प्राथमिकता देने का सुफल है। इसे कृपया नकदी हस्तांतरण का विषयवस्तु नहीं समझा जाना चाहिए।

कहना न होगा कि नरेन्द्र मोदी को लेकर बौद्धिक-कहकहे खूब हैं, लेकिन स्पष्ट, पारदर्शी और वैकल्पिक अंतःदृष्टि वाले सुझाव-विचार और मत का सर्वथा अभाव भी दिख रहा है। अधिसंख्य नरेन्द्र मोदी को ललकार रहे हैं या फटकार रहे हैं या कि कुछ बिल्ला-बहादुर तो फूंफकार के तेवर और भाषा में तनतना भी रहे हैं। यह सब अनावश्यक कसरत है। साथ मिल-बहुर कर राष्ट्रीय चेतना और कर्तव्यनिष्ठा के साथ विभिन्न मिशनरी पहलकदमियों में सहभागी और सक्रिय बनने की जरूरत है।

स्वयं मोदीजी को भी जरूरत है कि वे अपने ग्रहीता-भाव को अधिक व्यापक और बहुआयामी बनाए। ‘यूनिटी फाॅर रन’ जैसे लोकप्रियतावाही आयोजन से शारीरिक कसरत जरूर थोड़े-बहुत हो जाएंगे; किन्तु उससे चारित्रिक शुद्धता, प्रतिबद्धता और समाजोन्मुख चिन्तन-दृष्टि नहीं पनप सकती है। इसके लिए विशाल-विराट मूर्तियों के अनावरण की भी जरूरत नहीं है; क्योंकि सरदार पटेल की आदमकद मूर्ति देखकर किसी भारतीय नागरिक का हित न तो सधने वाला है और न ही मोदी जी की भीतरी इच्छाशक्ति एवं संकल्पशक्ति में ही बढ़ोतरी संभव है।

एक बात और इत्तला करना जरूरी है कि मि. प्राइम मिनिस्टर को अपनी मौलिक संकल्पना, विचार-दृष्टि एवं जन-प्रतिबद्धता के माध्यम से लोकतांत्रिक व सांविधानिक दायित्व का निर्वहन करना होगा। विदेशी प्रचारकों का कलात्मक-सर्जनात्मक सम्मोहन दस्तावेजी रंगरोगन और चित्रांकन-रंखांकन के लिए ठीक है; किन्तु वैयक्तिक व्यक्त्वि, व्यवहार, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता, समस्या-समाधान् आदि की दृष्टि से अपने कान-आंख और इन्द्रिय-बोध पर निर्भर रहना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

काफी पहले सन् 2002 में भी सरदार पटेल को लेकर नरेन्द्र मोदी की खुब खींचतान हुई है।
2002
कइयों ने उन्हें ‘पटेल का वारिस’ कहकर भी उन दिनों सम्बोधित किया था जिसे लेकर कई  राजनीतिज्ञों को घोर आपत्ति थी; मुझे भी है। यह बहुत बौनी लालसा  और दुर्बलता है। इससे औरों को संतुष्ट होने देना चाहिए। मि. प्राइमिनिस्टर को तो उस जनाकर्षण को महत्त्व देना चाहिए जो आप पर विश्वास करता है। कांग्रेस विश्वास छलकर जनता के 'डीएनए' से भी बाहर हो गई....मोदीजी इससे सीख लेंगे और इस ढर्रें को परम्परा बनने से रोकेंगे।

अंतिम बात, जनता जल्दी में नहीं है; बल्कि हड़बड़ी में हैं भाजपा के वे ज़मीनछोड़ राजनीतिज्ञ जो ‘मोदी’ पर कायम जनास्था को कभी लहर कहते हैं, तो कभी सुनामी। ये ऐसे मौकापरस्त लोग हैं जिनका एक ही काम रहा है अब तक-‘हम तो डूबेंगे ही सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे!’  


धन-ऋण

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मेरी समझ से तो हमारे भीतर एक कुदरती/प्रकृतिप्रदत टरबाइन है जो भीतरी
द्रव-अंश में घूर्णन करता है। इसी से निकसित होता है: धन-ऋण। धन-ऋण का यह
पारस्परिक संयोजन-संगुफन ही आत्मा है जो चेतना का सूचक है और शक्ति का
निर्माता। धन का बढ़ना दिव्य होना है, जबकि ऋण-अंश बढ़ने का तात्पर्य है
चेतना-शून्य, संज्ञाशून्य, जड़ और अंततः पदार्थ रूप होना है। जहां
द्रव-अंश नहीं है वह चित्तशून्य है। यथा-नाखून, बाल इत्यादि। शिशु को
पैदा होते ही सर्वप्रथम द्रव-अंश चाहिए होता है ताकि नाल कटाई के बाद की
खुराक उसके भीतरी अंतःप्रक्रिया से स्वतः प्राप्त हो सके।  वास्तव में यह
टरबाइन ठीक वैसी ही है जैसे प्यारी छोटी घड़ी में भीतरी यांत्रिकी का
दोलन-कंपन मिनट, घंटा और समय बताते हैं। अतः मानव-शरीर के रचना में पूरी
विज्ञान कार्य-कारण-सम्बन्ध के साथ समाहित एवं उपस्थित है। बस नहीं है तो
ईश्वर। जो स्वयं को सर्वाधिक असुरक्षित मानता है अथवा भयाक्रांत होता है;
ईश्वर सबसे ज्यादा उसी के चिंतन में रहते हैं। जो दृश्य है उसका विज्ञान
आपरूप घोषित है। इसलिए उसमें न माया है और न ही सम्मोहन। लेकिन जो समक्ष
है ही नहीं उसे लेकर पंडिताई-ओझाई सर्वथा उपयुक्त राह-दिशा है। यदि
धर्मखाने न हो तो स्पर्धा निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी हो जाएगी।
फिर सामंती ललाओं, मठ-मठीसियों का क्या होगा? इस कारण ईश्वर को बनाए रखना
ऐसे सभी लोग चाहते हैं। उसके होने या न होने पर वैज्ञानिक चिंतन-संवाद कम
ही लोग करने को राजी होते हैं।

रविवार, 2 नवंबर 2014

GPR>IPR IN GENOPOLITICS!


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  प्रस्तुति : राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ शोध अध्येता(जनसंचार एवं पत्रकारिता)
प्रयोजनमूलक हिन्दी, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय


First You Know that : GPR & IPR.

GPR stands for 'Generic Property Right' is better run in Indian context(Genopolitics) as a Golden Rule.
& IPR stands for 'Intellectual Property Right' यह शब्द तो इतना बहुप्रचारित है कि आप जानते ही होंगे। ‘जेनोपाॅलिटिक्स’ शब्दावली एवं प्रयोग में थोड़ा नया है जो भारतीय लोकतंत्र की एक प्रकार से कहें, तो जीवन-शक्ति है। अभिजात राज करेंगे, यह बात भारतीय लोकतंत्र में पूर्णतः प्रथारूढ़ रूप में अक्षत बनी हुई है। ‘जेनोपाॅलिटिक्स’ यानी इस अनुवंशी राजनीति का तीन ध्येय स्पष्ट है : पहला सामंतीपन, दूसरा कूटनीतिपन और तीसरा जातीय सुरक्षापन का भाव व विचार-बोध।....


(Making proposal for 'NEXT TOUR')

NEXT TOOR!




Option's are open in Global World!

मेट्रो-लाइफ@हिन्दी सिनेमा



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राजीव रंजन प्रसाद

विषय सूची:

भूमिका: कंक्रीटों तले म्हारा देश!

1. महानगर: अवधारणा एवं स्वरूप
>सामूहिक आवास की विविध इकाइयां
>महानगर: अवधारणा
>महानगर: सामाजिकता एवं संस्कृति
>समकालीन महानगर: विशिष्ट जीवन स्थितियां
>महानगरीय मध्यवर्ग
>महानगरीय झुग्गियां
>महानगरीय व्यक्ति: जीवन दर्शन, मनोविज्ञान एवं जीवनशैली

2. समकालीन हिन्दी सिनेमा
>सामान्य परिचय
>नवपूंजीवादी भूमंडलीकरण के प्रभाव
>लोकप्रियतावाद: मनोरंजन का रुचि बोध
>सिनेमा में हस्तक्षेप

3. समकालीन हिन्दी सिनेमा में महानगरीय जीवन
>समकालीन हिन्दी सिनेमा में महानगर
>मुंबई की केन्द्रीयता
>महानगर: सामाजिकता एवं संस्कृति
>समकालीन महानगर: विशिष्ट जीवन स्थितियां
>महानगरीय मध्यवर्ग
>महानगरीय झुग्गियां
>महानगरीय व्यक्ति: जीवन दर्शन, मनोविज्ञान एवं जीवनशैली
>महानगरीय बच्चें
>महानगरीय स्त्री

उपसंहार : आ जा...जरी वाले नीले आसमानों के तले

शनिवार, 1 नवंबर 2014

राजीतिक संचारक की भाषिक एवं कायिक पटकथा


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शोध पत्र प्रस्तुति : राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ शोध अध्येता(जनसंचार एवं पत्रकारिता)
प्रयोजनमूलक हिन्दी, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय

संचार : अर्थ, भूमिका, अनुप्रयोग, समकालीन महत्त्व, ग्लोबल नेतृत्व आदि

भाषा :
>भाषिक रूप, स्थिति, प्रयोग, प्रभाव,
>कायिक रूप, स्थिति, प्रयोग, प्रभाव

राजनीतिक संचारक : व्यक्तित्व, व्यवहार, नेतृत्व

प्रतिनिधि राजनीतिक संचारक : राहुल गाँधी, अरविन्द केजरीवाल, नरेन्द्र मोदी

राजनीतिक भाषणों का विश्लेषण :           
>वाग्मिता, वक्तृता
>विशिष्ट संचारक गुण
>साम्य-वैषम्य
>राजनीतिक अंतःदृष्टि
>ज़मीनी जुड़ाव
>सामाजिक सरोकार
>सम्बद्ध भूमिका
>दायित्व का निर्वहन
>निर्णय-क्षमता
>क्रियान्वयन
>सफलता
>नेतृत्व

अन्य युवा राजनीतिज्ञों से संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण

निष्कर्ष
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Walk With Mirror 
राजनीतिज्ञ संचारक का वैयक्तिक दायित्व
मेरे आलोचनात्मक निकष

1. सक्रिय आलोचनात्मक दृष्टिकोण
2. विवेकसम्मत चेतना
3. जनांकाक्षा के प्रति अटूट निष्ठा
4. नैतिक समझदारी और चारित्रिक बरताव
5. जन-बहुलता और जन-शक्ति को श्रेष्ठ-सर्वोपरि सत्ता मानने की धारणात्मक/संकल्पनात्मक प्रवृत्ति
6. जन-समस्याओं के हल अथवा निराकरण हेतु उच्च मनोबल, दृढ़इच्छाशक्ति और सेवा-समर्पण भाव
7. सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मोर्चे पर ठनी वर्गीय अंतद्र्वंद्वों एवं अंतर्विरोधों का समाधान
8. सामाजिक यथार्थ को केन्द्रीय भूमिका में रखते हुए जन-अभिमत तैयार करना।
9. राज्य-राष्ट्र की जनातांत्रिक संकल्पना को भौगोलिक चैहद्दी के सीमांकन-रेखांकन से ऊपर उठाना
10. नवाधुनिक, नवीन अथवा नवाचारयुक्त चेष्टाओं का अधिकाधिक आत्मसातीकरण
11. मानवीय-कौशल,अभिवृति एवं तकनीकी-प्रौद्योगिकी आधारित अनुप्रयोग को प्रोत्साहन 
12. ग्लोबल नेतृत्व हेतु स्वतंत्र मानस एवं आत्मनिर्भर समाज का निर्माण
13. परम्परा एवं संस्कृति में अनुस्यूत अरध्यात्मिक चेतना एवं दृष्टिकोण को अक्षुण्णय बनाए रखना
14. ‘अपनी मूल चारित्रिक सत्ता में अपना सर्वांगीण विकास’ का बहुद्देशीय एवं बहुआयामी लक्ष्य रखना
15. सामाजिक समरसता से वैश्विक-मिलाप तक में ‘सत्य’, अहिंसा’ और 'मानव-सेवा धर्म’ को अपनाना
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* तवज्जों या तरजीह देने की बात करना बेमानी है; लेकिन गंभीर तथ्याों, विचारों और विश्लेषणों पर गौर फरमाना बेहद जरूरी है।